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कृषि कानून 2020 , कृषि कानून क्या हें.

 

   जय हिन्द दोस्तों मे ‍M ZUNAID स्वागत करता हूँ आप का आज के इस Topic मे 

  आज का हमारा टॉपिक है क्रषि संसोधन अधिनियम 2020 

   तो शुरु करते है 

  हम दशको  से भारत एक क्रषि प्रधान देश की उक्ति को दोहराते आ रहे हैं और ये की भारत कि आधी से अधिक आबादी आज भी क्रषि कार्यो पर निर्भर है भारत मे क्रषि कि प्रधानता का होना जितना सच है उतना ही सच क्रषि का घाटे का शोदा होना है  2014 मे जब देश ने दशको मे पहली बार एक दल को पूर्ण बहुमत के साथ लोकसभा भेजा तो एक स्थिर सरकार से किसानो की आय व स्थिती मे क्रान्तिकारी बदलाव की भी आशा की गई नई सरकार ने इस दिशा मे कई परिवर्तन भी किये। जिसमे 2022 तक किसानो कि आय दोगुनी करना प्रमुख लक्ष्य है


   

हालाकि २०२२ प्रारम्भ होने मे एक वर्ष बचा है और किसान दोगुनी आय से काफी दूर है ऐसे मे सरकार द्वारा क्रषि व   किसानो की आय मे क्रांतिकारी बदलाव का दावा करते हुए संसद मे 3 अधिनियम पारित किये गये जिनमे 2 नये कानून है व एक संशोधन अधिनियम है 

ये अधिनियम 5 जून 2020 को अध्यादेश के रुप मे रुप मे लागु किये गये थे ,इन्हें संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किये जाने के बाद 27 सितम्बर 2020 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई 

संसद मे कानून पारित किये जाने के बाद इन अधिनियमों को किसान विरोधी बताकर काफी विरोध किया जा रहा है  हम तीनो अधिनियमों के प्रमुख प्रावधानों को समझते हुए इनके महत्व व लाभ तथा इनसे जुडी चिन्ताओ का विश्लेषण करेंगे , 


      


   इन अधिनियमों मे पहला अधिनियम "कृषक उपज व्यापर और वाणिज्य अधिनियम 2020 है 

  1.. इसका  उद्देश्य किसानो को उनकी फसल को बेचने के सदर्भ मे चयन की स्वतंत्रता प्रदान करना है 

2 . किसानो को APMC द्वारा विनियमित मंडियों से बाहर भी फसल बेचने का विकल्प दिया गया है  वे अपनी फसल अपने राज्य सहित अन्य राज्यों मे भी बेच सकते हैै यहाँ ये ये समझना महत्वपूर्ण है कि विचार APMC को बंद करने का नहीं है बल्कि किसानो की पसंद को विस्तार देने का है 

3 . इसके  तहत किसानो को अपनी फसल बेचने व क्रेता को फसल APMC के बाहर खरीदने कि स्वतंत्रता  दी गई है इसके लिये उन्हें कोई लाइसेंस धारण करने या APMC को किसी प्रकार का कोई शुल्क अदा करने कि कोई आवश्यकता नही होगी 

राज्य सरकारों को किसानो द्वारा APMC के बाहर  बेची जाने वाली उपज पर  APMC कानूनों  या किसी अन्य कानूनों के तहत किसी प्रकार का बाजार शुल्क , कोई उपकर या कोई अन्य शुल्क लगाने का अधिकार नहीं होगा .

4 . इसके तहत व्यक्तियो  , कृषक उत्पादक संघठनो व सहकारी संगठनो को इलेक्ट्रॉनिक्स टेडिंग प्लेटफार्म स्थापित करने का भी प्रावधान किया गया है जिससे किसानो की उपज की प्रत्यक्ष व ऑनलाइन खरीदारी की जा सके . 

5. किसान व व्यापारी के बीच किसी प्रकार के विवाद की स्थिती मे दोनों पक्षो के पास SDM के पास जाकर बात चित के जरिये समाधान निकलने का विकल्प होगा . SDM विवाद सुलझाने के लिए एक सुलह बोर्ड का घटन करेंगे यदि यह बोर्ड 30 दिनों के भीतर विवाद सुलझाने मे असफल रहता है तो दोनों पक्ष दोबारा SDM के पास जा सकते है SDM साहब इस मामले मे उपखंड प्राधिकारी होंगे तथा उन्हें भी 30 दिनों के भीतर विवाद का समाधान करना होगा , दोनों पक्षो को अपीलीय प्राधिकारी के पास चुनोती देने का अधिकार होगा. अपीलीय प्राधिकारी DM या उनके द्वारा नामित अडिशनल कलेक्टर होंगे , इनको भी 30 दिनों के भीतर विवाद सुलझाना होगा 


दुसरा अधिनियम कृषक कीमत आश्वासन और कृषी सेवा पर करार अधिनियम 2020 है.

 1. यह अधिनियम किसी उपज के उत्पादन या पालन से पूर्व क्रेता व क्रषक के बीच एक करार के माध्यम से कांट्रेक्ट फार्मिंग का ढांचा तैयार करता है इसके अंतगर्त कृषि करार कि व्यवस्था कि गयी है 

जैसे - व्यक्ति , भागीदारी कंपनी , सीमित दायित्व भागीदारी , सहकारी सोसायटी या सोसायटी शामिल है 

2. करार कि न्यूनतम अवधि एक फसल चक्र या किसी मवेशी के एक प्रजनन चक्र के लिए होगी . इसमें अधिकतम अवधि 5 वर्ष होगी . और 5 वर्ष से अधिक उत्पादन चक्र के लिए करार की अधिकतम अवधि कृषक व प्रायोजक के बीच परस्पर निर्धारित की जायगी .

3. बीज उत्पादन के सम्बंध मे अधिनियम के अंतगर्त डिलीवरी के समय प्रायोजक पर समस्त धनराशी का न्यूनतम दो तिहाई चुकाने की अनिवार्यता होगी, शेष धनराशि डिलीवरी की तारीख के 30 दिनों के भीतर चुकानी होगी .

       तीसरा अधिनियम 1955 मे संशोधन करता है

   1.  मूल अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार किसी वास्तु को आवश्यक वास्तु घोषित कर सकती है .

  2.  मूल अधिनियम ये व्यवस्था करता है की सरकार खाद्यान , दाल , आलू , प्याज , खाद्य तिलहन जैसे खाद्य पदार्थो को केवल असाधारण प्रस्तिथियो मे ही विनियमित कर सकती है 

 असाधारण परिस्थिती जैसे - युद्ध , प्राकतिक आपदा  

 3. 1955 से पहले व्यापारी किसानो से फसलो को ओने पाने दामो पर खरीद कर उनका भण्डारण कर लेते थे . इसे रोकने के लिए 1955 मे एक कानून बनाया गया था जिसके तहत पर कृषि उत्पादों पर एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गई थी . अब नया विधेयक " आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020 "  आवश्यक वस्तु की सूचि से अनाज , दाल , तिलहन , खाद्य तेल ,प्याज तथा आलू को हटाने के लिए लाया गया हैै 

 4. इन वस्तुओ पर राष्टीय आपदा व अकाल जैसी विशेष परिस्थियो के अलावा स्टॉक कि सीमा नहीं लगेगी . इसपर सरकार का मानना है कि अब देश मे कृषि उत्पादों को लक्ष्य से कही अधिक उत्पादित किया जा रहा है. किसानो को कोल्ड स्टोरज गोदामों और निवेश की कमी के कारण उचित लाभ नहीं मिल पाता है

      

 


      

    कृषि अधिनियम : महत्व व लाभ 

     तीनो अधिनियमों के प्रावधान का अध्ययन किये जाने पर ये काफी प्रगतशील व कृषि मे व्यापक सुधार की दृष्टि से लाये गये नजर आते है . 

 आज जब देश भर मे मुक्त बाजार संरचना के आधार पर आर्थिक गतिविध्या संचलित की जा रही है  

 तब भी कृषि कमोबेश मंडी और बिचोलियो के एकाधिकार मे बंधी हुई है कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य अधिकार के अंतर्गत कृषक APMC  मंडियों के एकाधिकार और बिचोलियो की जकड से बाहर जा सकेंगे 

  एक कृषक समुचित निर्णय के बाद उसे अपनी उपज कहाँ ,किसे ,और किस कीमत पर बेचनी है . यह तय कर सकेगा. तो स्वाभाविक है कि अधिकतर मोको पर उसे मंडियों से मिलने वाली कीमत से बेहतर ही दाम मिलेगा . 

 2.  इन अधिनियमों के माध्यम से अधिषेस उपज वाले क्षेत्रों मे किसानो को अपनी उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा. और कम उपज वाले क्षेत्रो मे  उपभोक्ताओ को कम कीमत पर कृषि उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे . इन कानूनों के सहारे सम्पूर्ण बाजार से जुड़ने के माध्यम से किसान आधुनिक प्रोद्योगिकी के ओर करीब आ सकेंगे .

 3. आवश्यक वस्तु अधिनियम के बारे मे बात कि जाय तो इसमें जमाखोरी रोकने के प्रावधान तब शामिल किये गए थे जब भारत का अपना खाद्य उत्पादन बहुत कम था और हमें खाद्यान्न आयत करना पड़ता था , ऐसे मे इस कानून के माध्यम से जमाखोरी नियंत्रित करना अनिवार्य था . 

 आज स्थिती ऐसी नहीं है भारत बड़ी मात्रा मे खाद्यान्न उत्पादों का निर्यात करता है . इस प्रकार नवीन बदलावों से कृषि बाज़ार अभाव की स्थिती के लिए बनाई गयी व्यवस्था से मुक्त होंगे तथा निवेशक कृषि बाजारों व कृषि उत्पाद मुल्यवर्धन श्रंखला की ओर आकर्षित होंगे.

                                                  

             कृषि अधिनियम : चिंताए 

1.   इस अधिनियम को लेकर सबसे बड़ी समस्या APMC तथा MSP के ख़त्म हो जाने की है यह माना जा रहा है , कि मुक्त बाज़ार व्यावस्था की ओर कृषि को आगे बढ़ाना सरकार के उसके एपीएमसी प्रदाता होने की भूमिका से पीछे हटने की ओर संकेत देता है . 

 किसान बड़ी कम्पनियो द्वारा भी शोषण को लेकर भी आशंकित है 

2. मंडियों मे होने वाले कृषि उत्पादों के क्रेय - विक्रेय से राज्यों सरकारों को भी आय होती है . विशेष रुप से पंजाब तथा हरियाणा राज्यों मे अधिशेष उपज होती है और एफसीआई के माध्यम से सरकार उस उपज का MSP पर क्रेय करती है जब किसानो के पास APMC के माध्यम से मंडियों के बाहर उपज बेचने का विकल्प होगा तो राज्यों कि आय का एक बड़ा भाग प्रभावित होगा .इसलिए अधिनियम के आलोचक सरकार के एक राष्ट एक बाज़ार के नारे के जवाब मे एक राष्ट एक MSP की बात कर रहे है   2006 मे बिहार राज्य ने निजी निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से अपना APMC कानून निरस्त कर दिया था , हालाँकि थोडा समय बीतने पर ही APMC के दायरे के बाहर उचित विपणन अवसंरचना के अभाव मे ये व्यवस्था हानिकारक साबित हुई . 

 किसानो को चिंता इस बात को लेकर भी है कि व्यापार व वाणिज्य अधिनियम मे वर्णित विवाद समाधान प्रक्रिया उनके विरूद्ध उपयोग की जा सकती है , और ऐसी स्थिती मे उनके पास न्यायालय जाने का भी विकल्प नहीं होगा .

3. कांट्रेक्ट फार्मिग कि बात की जाय तो इससे सम्बंधित अधिनियमों मे किसानो को कीमतों के आधार पर शोषण से सुरक्षा देने का अधिकार तो दिया गया है. परन्तु कीमते किस आधार पर तय की जायगी , इस पर अधिनियम मे बहुत अधिक स्पष्ट जानकारी नही दी गयी है 

 ऐसे मे किसानो को शोषण की नयी व्यवस्था तेयार होने की आशंका है ,  

 इसके अंतर्गत मोजूद विवाद निपटान तन्त्र भी चिंता का विषय है 

4. आवश्यक वस्तु अधिनियम मे भी सशोधन कर खाद्यान्न व अन्य खाद्य पदार्थो को सरल कर दिया है . यह चिंता जाहिर की रही है कि निर्यातक तथा व्यापारी इस व्यवस्था का उपयोग अधिक से अधिक जमाखोरी करने के लिए करेंगे , तथा इससे देश मे खाद्य पदार्थो की स्थिती प्रभावित होगी , इसके अलावा यह भी एक महत्वपूर्ण बात है की कृषि संविधान की राज्य सूचि का विषय है परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा पहले अध्यादेश के माध्यम से इतने बड़े बदलाव किये गए , तथा बाद मे संसद मे बेहद तेजी से अधिनियमों को पारित करा लिया गया 

  इस पूरी प्रीक्रिया मे राज्यों व अन्य हितधारको से विचार विमर्श न किया जाना,

                                संघीय ढांचे पर बड़ा आघात है .......   

Tech Qureshi.


 

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