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 उत्तर प्रदेश धर्मांतरण कानून 2020

Tech Qureshi:-एक लोकतान्त्रिक देश में नागरिको को जो अधिकार दिऐ जाते है, उनमे कुछ किसी एक व्यक्ति के हित में होते है तो वहीँ कुछ सामुदायिक हितो में भी होते है. भारतीय संविधान द्वारा अनुछेद 25 - 28 के तहत धर्म की स्वतंत्रा का अधिकार एक ऐसा मोलिक अधिकार है. जो व्यक्ति और समुदाय दोनों का हित करता है.

 


धार्मिक स्वतंत्रा के तहत किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रा तो है, लेकिन जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराने की नहीं, इसलिय इसे रोकने के लिए राज्य को भी कानून बनाने का अधिकार मिल जाता है. परन्तु धार्मिक स्वतंत्रा अधिकांश लोगो के लिए बेहद निजी मामला है.

       उत्तर प्रदेश में अवैध धर्मांतरण कानून 

  •  नवम्बर 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा " उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध ,2020 " कानून लागु किया गया.
  • इस कानून में विवाह के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन के दिए गये प्रलोभन के विरुद्ध प्रावधान किये गये है.
  • धर्म परिवर्तन की तारीख से 60 दिन पहले , धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति और धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति को 30 दिन पूर्व जिलाधीश के समक्ष घोषणा पत्र जमा करना होगा. इसका उल्लंघन किये जाने पर धर्मांतरण को अवैध घोषित कर दिया जायेगा.
  • उल्लंघन करने वाले व्यक्ति में धर्मांतरण करने वाले व कराने वाले को क्रमश: 6 माह - 3 वर्ष व 1-5 वर्ष तथा साथ ही 10,000 रूपये व 25,000 रूपये से दण्डित किया जायेगा.
  • यदि विवाह के उद्देश्य से अवैध धर्मांतरण या अवैध धर्मांतरण के उद्देश्य से विवाह किया गया है , तो ऐसे विवाह को भी अवैध घोषित कर दिया जायेगा. 
  • यदि विवाह के बाद भी धर्मांतरण इस अध्यादेश के प्रावधानों के तहत नहीं किया गया तो ,  तब भी विवाह अवैध घोषित कर दिया जायेगा. 
  • यदि 2 या 2 से अधिक लोगो पर अवैध धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति को 3-10 वर्ष तक जेल तथा नाबालिक महिला या अनुसूचित जाति या जनजाति से सम्बंधित व्यक्ति का धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति को 2-10 वर्ष तक कारावास का प्रावधान है. 



भारत में धर्मांतरण-रोधी कानून

 अभी तक धर्मांतरण की रोकथाम के उद्देश्य से कोई भी केन्द्रीय कानून नहीं बना है. साल 2015  में  विधि मंत्रालय ने संसद में स्पष्ट किया था. कि धर्मांतरण के लिए कानून बनाना संसद के विधायी क्षेत्राधिकार का हिस्सा नहीं है. 



लेकिन इससे पहले 50 के दशक में ऐसा कानून बनाने के उद्देश्य से संसद में कुछ निजी सदस्य विधेयक लाये गये थे और धर्मांतरण से सम्बंधित कानून बनाये गये. 

    1967            -  ओडिशा 

    1968 , 2021 -  मध्य प्रदेश 

    1978-             अरुणाँचाल 

    2006 , 2019 -  हिमाचल प्रदेश 

    2017            -  झारखण्ड 

    2018            -  उत्तराखंड 

    2020            - उत्तर प्रदेश

 

 कानून की चिंताएँ 

इस कानून के द्वारा लोगो के सामने आने वाली सबसे बड़ी चिंता की बात ये है. इनके माध्यम से लोगो की धार्मिक स्वतंत्रा में हस्ताक्षेप करते हुए . धर्मनिरपेक्ष जेसे संवेधानिक आदर्शो पर प्रहार किया जायेगा.

2018 के प्रसिद्ध " शफीन जहाँ बनाम अशोक के. एम. " मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा की जीवन साथी चुनना संविधान के अनुच्छेद- 21 के तहत मोलिक अधिकार है . सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार , संविधान प्रत्येक व्यक्ति के जीवन साथी चुनने व धर्म चुनने की स्वतंत्रा प्रदान करता है. 

ऐसे कानून से ऐसा भी प्रतीत होता है कि विधि निर्माता उस गहरी पित्रसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित है , जहाँ महिलाओ को कमजोर मानते हुए , अपने ही जीवन से जुड़े निणर्य लेने की स्वतंत्रता न देते हुए उन्हें परिवार व समुदाए के नियंत्रण में रखा जाता है. इस तरह का धर्मांतरण रोकने वाला कानून लाने से संप्रदाय सदभाव की समस्या को और ज्यादा गहरा कर सकते है. 

अध्यादेश के पक्ष में तर्क

किसी भी कानून का निर्माण करने से पहले संवेधानिक व विधिक आदर्शो के साथ उसकी व्यावहारिक आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाता है. अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए लाए गये इस कानून को संवेधानिक व कानूनों की नजर से देखा जाये तो ये मोलिक अधिकार का उल्लंघन प्रतीत होते है.हालाँकि व्यावहारिक व तथ्यात्मिक सच्चाई पर नजर डाले तो ये कानून एकदम तार्किक नजर आते है. 

आये दिन महिलाओ को विवाह का झांसा देकर उनका धर्म परिवर्तन कराने , धर्म परिवर्तन का विरोध करने की स्तिथि में उनके साथ हिंसा व उनकी हत्या तक कर दिए जाने की घटनाए सुनने को मिलती है. ऐसे में वर्तमान कानून इन समस्याओ को रोकने में सक्षम नहीं है. तो नये कानूनी बदलावों  के माध्यम से इन्हे रोका जाना आवश्यक है. 

यदि महिलाओ के अधिकार के हनन की बात की जाये तो यह समझना आवश्यक है कि जितने भी अवैध धर्मांतरण होते है उनमे सबसे ज्यादा पीड़ित महिलाएँ ही है इसलिए अवैध धर्मांतरण को रोकने के राज्यों के प्रयासों को इसी रूप में देखा जाना चाहिये. 

 

 

 

 

 

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