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भीमा कोरेगावं युद्ध की 203वीं वर्षगांठ

 हर साल पहली जनवरी को भीमा कोरेगांव में दलित समुदाय बड़ी संख्या में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1818 में पेशवा की सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाये थे.

 


भीमा कोरेगांव में दलित क्यों मनाते हैं जश्न

भीमा-कोरेगावं को दलित समुदाएँ के लोग अपने लिए पवित्र मानते है. इसलिए दलित समुदाए के लोग हर साल 1 जनवरी को पुणे के भीमा कोरेगांव में स्थित वॉर मेमोरियल पर इकट्ठा होते हैं. 

1 जनवरी 2021 को वर्ष 1818 में हुए भीमा-कोरेगावं युद्ध की 203वीं वर्षगाँठ मनाई गई. महाराष्ट्र के पुणे स्थित पेरने गाँव में भीमा-कोरेगावं युद्ध के सेनिको की स्मृति में रणस्तम्भ या जयस्तंभ का निर्माण किया गया. जहाँ प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी को इस युद्ध की वर्षगाँठ मनाई जाती है. 

क्या है मराठा साम्राज्य के पीछे का इतिहास  

भीमा-कोरेगाँव के पीछे का इतिहास क्या है.

एक जनवरी 1818 को पेशवा के सेनिको और अंग्रेजो के बीच भीमा-कोरेगाँव में युद्ध हुआ इस युद्ध में ब्रिटिश सेना में बड़ी संख्या में दलित सेनिक शामिल थे. इन सेनिको ने उच्च जाति बहुल पेशवा सेना का मुकाबला किया था. ब्रिटिश सेना ने पेशवा सेना को हरा दिया था.


 पेशवा सेना की हार को जाति-आधारित भेद-भाव और उत्पीड़न के खिलाफ एक जीत माना गया था.

यह तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध (वर्ष 1817-18) की अंतिम लड़ाइयों में से एक थी. जिसने पेशवा वर्चस्व को समाप्त कर दिया.

1 जनवरी 1927 को बाबा साहब अम्बेडकर के इस स्थान पर आने से दलित समुदाए के लोगो में इस युद्ध की याद ताज़ा हो गई, जिससे यह रेली स्थल गोरव का प्रतीक बन गया.


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